भीलवाड़ा में गौ माता की पुकार—कौन सुनेगा मेरी फरियाद?शहर की सड़कों पर भटकती इन गायों की सुध आखिर कौन लेगा?

भीलवाड़ा में गौ माता की पुकार—कौन सुनेगा मेरी फरियाद?

शहर की सड़कों पर भटकती इन गायों की सुध आखिर कौन लेगा?

गौरव रक्षक/राजेंद्र शर्मा

भीलवाड़ा,15 अगस्त 2026

भीलवाड़ा शहर में गौ सेवा और गौ संरक्षण की बातें करने वालों की कोई कमी नहीं है। गौ माता के नाम पर धार्मिक आयोजन होते हैं, चंदे जुटाए जाते हैं, दान दिया जाता है और कई गोशालाएं भी संचालित हो रही हैं। सरकार भी विभिन्न माध्यमों से गौ संरक्षण के लिए राशि जुटाती है। इसके बावजूद भीलवाड़ा की सड़कों पर बेसहारा और आवारा गायों की स्थिति एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।
शहर के बाजारों, मुख्य मार्गों और कॉलोनियों में आए दिन गायों को सड़कों के बीच खड़े या बैठे देखा जा सकता है। कई बार ये गायें यातायात के बीच घंटों तक रहने को मजबूर होती हैं। तेज रफ्तार वाहनों के बीच उनकी जान पर खतरा मंडराता रहता है। सवाल यह है कि जब गौ माता के नाम पर इतना कुछ किया जा रहा है, तो फिर सड़कों पर भटकती इन गायों की सुध आखिर कौन लेगा?
गौ माता के नाम पर दान बहुत, व्यवस्था कितनी?
भीलवाड़ा में गौ भक्तों और दानदाताओं की कमी नहीं है। शहर और आसपास के क्षेत्रों में अनेक लोग नियमित रूप से गौ सेवा करते हैं। कई संस्थाएं और गोशालाएं भी अपने स्तर पर काम कर रही हैं। इसके बावजूद यदि बड़ी संख्या में गायें सड़कों पर भोजन की तलाश में भटक रही हैं, तो यह व्यवस्था की समीक्षा करने का समय है।
गौ सेवा केवल धार्मिक भावना व्यक्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असली गौ सेवा तब होगी, जब गायों को सुरक्षित आश्रय, पर्याप्त चारा, स्वच्छ पानी और उपचार की सुविधा मिले तथा उन्हें सड़कों पर प्लास्टिक और कचरे के ढेर में भोजन तलाशने के लिए मजबूर न होना पड़े।

गाय के नाम पर दुकानें चलाने वालों से भी सवाल

आज गौ माता के नाम पर अनेक प्रकार की गतिविधियां और संस्थाएं संचालित होती हैं। धार्मिक आयोजनों से लेकर चंदा संग्रह तक, गौ सेवा के नाम पर समाज से सहयोग लिया जाता है। ऐसे में समाज का यह सवाल जायज है कि गौ माता के नाम पर एकत्र होने वाली राशि का कितना हिस्सा वास्तव में गायों की देखभाल पर खर्च हो रहा है?
यदि गौ माता के नाम पर लोगों से सहयोग लिया जा रहा है, तो उस धन के उपयोग में पारदर्शिता भी होनी चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि दान की राशि कहां खर्च हो रही है और उससे कितनी गायों को लाभ मिल रहा है।

दूध लिया, फिर सड़क पर छोड़ दिया—क्या यही गौ सेवा है?

सबसे बड़ा सवाल उन लोगों से भी है जो गायों से दूध तो निकालते हैं, लेकिन उसके बाद उनकी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। जब गाय दूध देना बंद कर देती है, तो कई पशु मालिक उन्हें सड़कों पर छोड़ देते हैं। यही गायें फिर शहर की गलियों और बाजारों में भटकती हैं।
क्या गौ माता केवल तब तक हमारी जिम्मेदारी है, जब तक वह दूध देती है?
यदि कोई व्यक्ति पशु पालता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल दूध प्राप्त करने तक नहीं होनी चाहिए। पशु के जीवनभर भोजन, पानी, उपचार और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए।
प्लास्टिक और जूठे दोने बन रहे हैं मौत का कारण
सड़कों पर खाने के बाद फेंके गए जूठे दोने, डिस्पोजल और प्लास्टिक की थैलियां गायों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। भूखी गायें कचरे के ढेर में भोजन तलाशते हुए प्लास्टिक भी खा जाती हैं।
यह केवल सफाई की समस्या नहीं, बल्कि पशु सुरक्षा और मानवीय संवेदनशीलता का भी प्रश्न है। बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। दुकानदारों, ठेले वालों और आम नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सड़क पर फेंका गया एक प्लास्टिक का थैला किसी गौवंश की जान ले सकता है।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से जवाबदेही की अपेक्षा
गौ संरक्षण केवल किसी एक विभाग या संस्था की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। नगर निकाय, जिला प्रशासन, पशुपालन विभाग, जनप्रतिनिधि, गोशाला संचालक और समाजसेवी संस्थाओं को मिलकर ठोस व्यवस्था बनानी होगी।
शहर में बेसहारा गायों की पहचान, उनके लिए सुरक्षित आश्रय, नियमित चारा-पानी, पशु चिकित्सा सुविधा और जिम्मेदार पशुपालकों की निगरानी जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाया जाना चाहिए। साथ ही सड़क पर पशुओं को छोड़ने और सार्वजनिक स्थानों पर प्लास्टिक-कचरा फेंकने वालों के खिलाफ नियमों के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
गौ माता की आवाज को नारों से नहीं, व्यवस्था से सुनना होगा
गौ माता के नाम पर नारे लगाना आसान है, लेकिन उसकी वास्तविक सेवा करना जिम्मेदारी का काम है। धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी है।
आज भीलवाड़ा की सड़कों पर भटकती गायें मानो इंसान से यही सवाल पूछ रही हैं—
“जब मेरे नाम पर दान दिया जाता है, जब मेरे नाम पर आयोजन होते हैं, जब मेरे नाम पर भावनाएं जागती हैं, तो फिर मेरे लिए सुरक्षित आश्रय, चारा और पानी क्यों नहीं?”
यह सवाल केवल सरकार से नहीं, बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति से है जो स्वयं को गौ भक्त कहता है।
गौ सेवा का अर्थ केवल गाय को एक दिन चारा खिला देना नहीं है। गौ सेवा का वास्तविक अर्थ है—उसकी सुरक्षा, सम्मान, भोजन, उपचार और जीवनभर की जिम्मेदारी।
भीलवाड़ा को अब गौ माता की इस पुकार का जवाब भावनाओं और नारों से नहीं, बल्कि ठोस व्यवस्था, पारदर्शिता और प्रभावी कार्रवाई से देना होगा।

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