निर्दलीय विधायक कोठारी ने ठोका खूंटा, बीजेपी के हलक में अटकी आवाज..
भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव में बढ़ी सियासी गर्मी, शक्ति प्रदर्शन ने भाजपा खेमे में बढ़ाई बेचैनी
गौरव रक्षक/राजेंद्र शर्मा
भीलवाड़ा , 23अगस्त 2026
भीलवाड़ा की राजनीति में नगर निगम चुनाव से पहले ही शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। अभी चुनावी रण का बिगुल पूरी तरह बजा भी नहीं है, लेकिन राजनीतिक मोहरों की चाल ने माहौल को गरमा दिया है। खासकर निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी के कार्यकर्ता स्नेह मिलन कार्यक्रम ने शहर की सियासत में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह महज स्नेह मिलन था या शक्ति प्रदर्शन? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कार्यक्रम में जिस अंदाज में समर्थकों, नेताओं, व्यापारियों और विभिन्न सामाजिक-धार्मिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों की मौजूदगी दिखाई दी, उसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
कोठारी ने मंच से भले ही सीधे-सीधे कोई राजनीतिक चुनौती न दी हो, लेकिन कार्यक्रम की तस्वीरें और माहौल अपने आप में बहुत कुछ कह गए। संदेश साफ पढ़ा जा सकता है—”हमें नजरअंदाज करके भीलवाड़ा की राजनीति की पटकथा लिखना आसान नहीं होगा।”
कोठारी ने ठोका खूंटा, अब किस करवट बैठेगा ऊंट?
राजनीति में कई बार भाषण से ज्यादा तस्वीर बोलती है।

कोठारी के स्नेह मिलन कार्यक्रम में मंच पर दिखाई दिए चेहरे भी इसी तस्वीर का हिस्सा हैं। नेता, व्यापारी और सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की मौजूदगी को यदि राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो यह एक तरह का शक्ति प्रदर्शन नजर आता है।
यह संदेश देने की कोशिश भी मानी जा सकती है कि कोठारी के साथ केवल उनका राजनीतिक संगठन या समर्थकों का एक वर्ग नहीं, बल्कि समाज के अलग-अलग तबकों में भी उनकी पहुंच है।
यही बात भाजपा के स्थानीय नेतृत्व के लिए चिंता का कारण बन सकती है।
क्योंकि नगर निगम का चुनाव केवल पार्षदों का चुनाव नहीं होता। यह शहर की राजनीतिक नब्ज पर पकड़ का चुनाव भी होता है। यदि भाजपा को बहुमत का बोर्ड बनाना है तो उसे हर उस समीकरण को साधना होगा, जो चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
और यहां सवाल यही है—क्या भाजपा कोठारी को साथ लेकर चलेगी, उनके प्रभाव को स्वीकार करेगी या अपनी अलग राजनीतिक राह बनाएगी?
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल—’बोर्ड किसके हाथ?‘
भीलवाड़ा में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कांग्रेस या अन्य राजनीतिक ताकतें नहीं हैं। असली चुनौती स्थानीय समीकरणों की है।
निर्दलीय विधायक के रूप में अशोक कोठारी की राजनीतिक मौजूदगी को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए कितना आसान होगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना जरूर है कि आज के कार्यक्रम ने यह संकेत दे दिया है कि नगर निगम चुनाव में कोठारी को एक मामूली खिलाड़ी समझना शायद राजनीतिक भूल साबित हो सकती है।
राजनीति में संख्या ही अंतिम सत्य होती है। चुनाव के दिन कौन किसके साथ खड़ा होता है, कौन किसके वोट काटता है और कौन किसके वोट जोड़ता है—यही तय करता है कि सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी।
विट्ठल शंकर अवस्थी का ठंडा जवाब, लेकिन सवाल गर्म
कोठारी के कार्यक्रम को लेकर जब पूर्व विधायक विट्ठल शंकर अवस्थी से उनका नजरिया जानने की कोशिश की गई तो उनका जवाब बेहद नपा-तुला रहा।
उन्होंने कहा कि यह उनका निजी कार्यक्रम है और हमारी पार्टी की रणनीति पार्टी नेतृत्व तय करेगा।
सियासत में कभी-कभी छोटा जवाब भी बड़े संकेत छोड़ जाता है। अवस्थी का यह संयमित बयान बताता है कि भाजपा फिलहाल इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया देने के बजाय पूरे घटनाक्रम को देखना और समझना चाहती है।
लेकिन राजनीति में सवाल यह नहीं होता कि कौन क्या कह रहा है, सवाल यह होता है कि पर्दे के पीछे क्या गणित तैयार हो रहा है।
कोठारी का शक्ति प्रदर्शन भाजपा के लिए चेतावनी या सौदेबाजी का संकेत?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि कोठारी का कार्यक्रम सीधे तौर पर भाजपा को चुनौती देने के लिए था। लेकिन राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो इस तरह का बड़ा जमावड़ा निश्चित तौर पर राजनीतिक संदेश देता है।
क्या यह संदेश है कि “मेरे बिना भीलवाड़ा नगर निगम का गणित अधूरा है?”
क्या यह संकेत है कि “निर्णय लेते समय मेरी ताकत और मेरे समर्थकों को नजरअंदाज मत करना?”
या फिर यह केवल अपने कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने का कार्यक्रम था?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन राजनीति में बीज बोया जा चुका है और अब उसकी फसल चुनाव परिणाम के रूप में सामने आएगी।
सबसे बड़ा खेल टिकट और समीकरणों का होगा
नगर निगम चुनाव में सबसे ज्यादा महत्व टिकट वितरण का होता है। टिकटों का बंटवारा यदि किसी एक वर्ग या गुट को नाराज करता है तो उसका सीधा असर चुनावी मैदान में दिखाई दे सकता है।
यहीं पर कोठारी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि भाजपा और कोठारी के बीच राजनीतिक तालमेल बनता है तो यह भाजपा के लिए फायदे का सौदा हो सकता है। लेकिन यदि दोनों के रास्ते अलग-अलग होते हैं तो मुकाबला कई सीटों पर त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है।
और स्थानीय चुनाव में यही स्थिति सबसे खतरनाक होती है—जब जीतने के लिए बड़े वोट बैंक की जरूरत नहीं होती, बल्कि सामने वाले के वोटों को बांट देना ही काफी होता है।
‘सर्वज्ञानी होने का भ्रम’ कहीं भारी न पड़ जाए
राजनीति में अहंकार सबसे खतरनाक हथियार है। जो नेता यह मान लेता है कि उसके बिना राजनीति चल ही नहीं सकती, वह भी गलती करता है और जो यह मान ले कि सामने वाला कुछ नहीं कर सकता, वह उससे भी बड़ी गलती करता है।
इसीलिए वह कहावत यहां बिल्कुल सटीक बैठती है—
“इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसका अज्ञान या मूर्खता नहीं, बल्कि उसके सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिशाली होने का भ्रम है।”
नगर निगम चुनाव में भाजपा यदि यह मानकर चलती है कि संगठन की ताकत के सामने हर व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव छोटा है, तो उसे चुनावी गणित का हिसाब चुकाना पड़ सकता है।
वहीं दूसरी ओर यदि कोठारी यह मान लें कि आज का शक्ति प्रदर्शन ही कल की चुनावी जीत की गारंटी है, तो यह भी राजनीतिक भ्रम साबित हो सकता है।
क्योंकि भीड़ और वोट में अंतर होता है, समर्थन और मतदान में अंतर होता है और मंच की तस्वीर तथा मतदान केंद्र की तस्वीर में भी बहुत अंतर होता है।
अब असली परीक्षा शुरू
फिलहाल कोठारी ने अपना खूंटा जरूर ठोक दिया है। भाजपा ने भी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक ताकतें भी निश्चित रूप से इस पूरे घटनाक्रम पर नजर गड़ाए बैठी होंगी।
आने वाले दिनों में टिकट वितरण, स्थानीय नेताओं की सक्रियता, सामाजिक समीकरण, वार्डवार रणनीति और संभावित गठजोड़ इस तस्वीर को और साफ करेंगे।
अब देखना यह है कि राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठता है।
क्या कोठारी और भाजपा के बीच कोई रास्ता निकलता है?
क्या भाजपा अपने संगठनात्मक दम पर मैदान में उतरती है?
क्या कोठारी अपने प्रभाव को नगर निगम चुनाव में अलग राजनीतिक ताकत में बदल पाते हैं?
या फिर चुनावी मैदान में उतरते ही आज के शक्ति प्रदर्शन की असली परीक्षा हो जाएगी?
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस का मुकाबला नहीं रह गया है। स्थानीय राजनीति में नए समीकरण आकार ले रहे हैं और निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी ने अपने स्नेह मिलन के जरिए यह संकेत जरूर दे दिया है कि उन्हें राजनीतिक पटकथा का सिर्फ दर्शक समझना भारी भूल हो सकती है।
अब गेंद भाजपा के पाले में है—देखना यह है कि वह इसे संभालती है, कोठारी के साथ तालमेल बैठाती है या फिर चुनावी मैदान में आमने-सामने की टक्कर स्वीकार करती है।

