सावधान ! भीलवाड़ा के विकास की दुर्दशा देखकर फिर फैसला करना—क्या पांच साल के लिए फिर ऐसे हाथों में सौंपना है शहर ?
गौरव रक्षक/राजेंद्र शर्मा
भीलवाड़ा, 23 अगस्त 2026
भीलवाड़ा की जनता भोली जरूर है, लेकिन उसे भूलने की बीमारी नहीं होनी चाहिए। चुनाव आते ही कुछ नए और पुराने चेहरे, बड़े-बड़े दावे, वही विकास के सपने और वही मीठी बातें एक बार फिर आपके दरवाजे पर दस्तक देंगी। कोई पैर छुएगा, कोई भावनात्मक अपील करेगा, कोई खुद को शहर का सबसे बड़ा विकास पुरुष बताएगा और कोई धर्म, समाज, जाति तथा रिश्तों के नाम पर वोट मांगता नजर आएगा।
लेकिन सवाल सिर्फ इतना है—पिछले वर्षों में भीलवाड़ा को मिला क्या ?
एक बार अपने घर से बाहर निकलकर शहर की सड़कों को देखिए। टूटी सड़कें, जगह-जगह गड्ढे, कचरे के ढेर, अव्यवस्थित यातायात, बाजारों में आवारा पशुओं और कुत्तों का जमावड़ा, सीवरेज के नाम पर हुए घटिया और अधूरे काम तथा बारिश आते ही जलभराव की समस्या—क्या यही वह विकास है जिसके नाम पर हर चुनाव में वोट मांगे जाते हैं?
गड्ढों से भरी सड़कों पर बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग रोज जोखिम उठाकर निकलते हैं। वाहन चालक दुर्घटना के डर से परेशान हैं। कहीं सड़क बनी तो कुछ ही समय बाद टूट गई, कहीं सड़क खोदकर छोड़ दी गई और कहीं सीवरेज के नाम पर जनता को महीनों तक धूल, कीचड़ और परेशानी झेलनी पड़ी।
तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है—आखिर विकास का पैसा गया कहां?
जनता के सामने असली परीक्षा
अब एक बार फिर चुनावी मौसम में बड़े-बड़े वादों की बरसात होगी। विकास के मॉडल दिखाए जाएंगे। योजनाओं की लंबी सूची गिनाई जाएगी। कहा जाएगा कि अब शहर की तस्वीर बदल देंगे।
लेकिन जनता को इस बार भावनाओं में नहीं, पिछले कामों के हिसाब-किताब में फैसला करना चाहिए।
किसने क्या वादा किया था?
कितना काम हुआ?
कितना पैसा खर्च हुआ?
किस सड़क की कितनी बार मरम्मत हुई?
सीवरेज का काम कितना गुणवत्तापूर्ण हुआ?
कचरा प्रबंधन की स्थिति क्या है?
शहर के प्रमुख बाजारों और कॉलोनियों की हालत कैसी है?
इन सवालों के जवाब मांगना जनता का अधिकार है।
भ्रष्टाचार के खेल पर सवाल जरूरी
शहर में निर्माण स्वीकृतियों और नियमों को लेकर आम नागरिकों के बीच लंबे समय से तरह-तरह की शिकायतें और चर्चाएं सुनने को मिलती रही हैं। आरोप यह भी लगाए जाते हैं कि कुछ लोग नियमों की जानकारी के अभाव का फायदा उठाकर पहले लोगों को निर्माण संबंधी औपचारिकताओं से बचने की सलाह देते हैं और बाद में उसी निर्माण को शिकायत, नोटिस अथवा कार्रवाई के दबाव का माध्यम बना दिया जाता है।
यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो यह केवल किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल है।
किसी आम आदमी ने जिंदगी भर की मेहनत की कमाई से जमीन खरीदी। मकान, दुकान या कॉम्प्लेक्स बनाने का सपना देखा। उसे कानून और नियमों के अनुसार स्वीकृति लेने के लिए स्पष्ट व्यवस्था मिलनी चाहिए—न कि ऐसी स्थिति जहां पहले उसे भ्रमित किया जाए और बाद में कथित शिकायतों के नाम पर परेशान किया जाए।
अगर ऐसे आरोप सही हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषी कोई भी हो—उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि भ्रष्टाचार किसी एक व्यक्ति की जेब नहीं काटता, वह पूरे शहर के विकास को खोखला करता है।
चुनाव आते ही बदल जाएगा चेहरा, लेकिन क्या बदलेगी नीयत?
सबसे बड़ा खतरा यही है कि चुनाव के समय पुरानी यादें धुंधली कर दी जाती हैं।
नया पोस्टर।
नया नारा।
नया चेहरा।
नई घोषणाएं।
नई उम्मीदें।
और फिर जनता से कहा जाता है—“इस बार मौका दीजिए।”
लेकिन जनता को पूछना चाहिए—“पिछली बार जो मौका दिया था, उसका हिसाब क्या है?”
सिर्फ भाषण देने से शहर विकसित नहीं होता। सिर्फ शिलान्यास के पत्थर लगाने से विकास नहीं होता। सिर्फ फोटो खिंचवाने से सड़कें मजबूत नहीं होतीं और सिर्फ घोषणाओं से सीवरेज की समस्या खत्म नहीं होती।
विकास जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
साम, दाम, दंड, भेद से सावधान!
चुनाव के समय आपको तरह-तरह के प्रलोभन दिए जा सकते हैं। कोई व्यक्तिगत मदद का भरोसा देगा, कोई जाति और समाज के नाम पर भावनात्मक माहौल बनाएगा, कोई धर्म का सहारा लेगा और कोई आपके घर आकर अपने पुराने रिश्तों की दुहाई देगा।
संभव है कोई आपके पैर भी छुए और खुद को आपका सबसे बड़ा शुभचिंतक बताए।
लेकिन याद रखिए—
पैर छूने वाला जरूरी नहीं कि शहर की सड़क भी ठीक कराए।
मीठी बातें करने वाला जरूरी नहीं कि जनता की आवाज भी सुने।
विकास की तस्वीर दिखाने वाला जरूरी नहीं कि जमीन पर विकास कराए।
इसलिए व्यक्ति के शब्द नहीं, उसका काम देखिए।
पांच साल बहुत लंबा समय होता है
वोट डालना केवल एक दिन का निर्णय है, लेकिन उसका प्रभाव पूरे पांच साल तक रहता है।
गलत व्यक्ति को चुनने की कीमत जनता को रोज चुकानी पड़ सकती है—खराब सड़क के रूप में, गंदगी के रूप में, खराब व्यवस्था के रूप में, भ्रष्टाचार की शिकायतों के रूप में और विकास के नाम पर लगातार होने वाली परेशानियों के रूप में।
इसलिए इस बार सवाल किसी पार्टी से ज्यादा व्यवस्था और जवाबदेही का होना चाहिए।
जिसने काम किया है, उसे काम के आधार पर वोट दीजिए।
जिसने सवाल उठाए हैं, उसे उसके संघर्ष के आधार पर परखिए।
और जिस पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उसके बारे में निष्पक्ष जानकारी लेकर ही फैसला कीजिए।
किसी पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन लोकतंत्र में आरोप का अंतिम फैसला जांच और कानून करता है। इसलिए जनता को भावनात्मक प्रचार नहीं, तथ्यों और काम के रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
अब फैसला भीलवाड़ा की जनता के हाथ में है
भीलवाड़ा की जनता से अपील है—इस बार वोट जरूर करें। लोकतंत्र में मतदान आपका अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।
लेकिन वोट देने से पहले एक बार-
अपने शहर की सड़कों को देखिए।
कचरे के ढेर देखिए।
सीवरेज की स्थिति देखिए।
आवारा पशुओं की समस्या देखिए।
अपने वार्ड की हालत देखिए।
और फिर खुद से एक सवाल पूछिए—
“क्या मैं अगले पांच साल भी यही सब देखना चाहता हूं?”
अगर जवाब नहीं है, तो इस बार फैसला सोच-समझकर कीजिए।
किसी के बहकावे में नहीं।
किसी के दबाव में नहीं।
किसी के लालच में नहीं।
किसी के पैर छूने से प्रभावित होकर नहीं।
काम देखिए, चरित्र देखिए, जवाबदेही देखिए और फिर अपना वोट दीजिए।
क्योंकि लोकतंत्र में नेता जनता का मालिक नहीं होता—जनता उसे पांच साल के लिए जिम्मेदारी सौंपती है।
और याद रखिए—
वोट आपका है, फैसला आपका है और अगले पांच साल भी आपके ही हैं।
इसलिए सोचिए… समझिए… सवाल पूछिए… और फिर वोट कीजिए।
लेकिन वोट जरूर कीजिए।

