महाराज किल्बिस की जय हो अंधेरा कायम रहे: लोभी गुरु लालची चेला, भीलवाड़ा में हो रहा खेला रे खेला….

(प्रतीकात्मक चित्र)

महाराज किल्बिस की जय हो अंधेरा कायम रहे: लोभी गुरु लालची चेला, भीलवाड़ा में हो रहा खेला रे खेला….

✍️ पत्रकार: राजेंद्र शर्मा , भीलवाड़ा,12अप्रैल 2026

देखने में ऐसा लगा रहा है कि भीलवाड़ा में अंधभक्ति चरण सीमा पर है, और धर्म के ठेकेदार इन्हीं अंध भक्तों पर सवार हो कर धार्मिक आयोजनों की आड़ में चांदी कूट रहे हैं धर्म के नाम पर लोगों की जेबें काट रहे हैं।
यही नहीं, अब यह पूरा तंत्र एक सुनियोजित व्यवस्था का रूप ले चुका है, जिसमें भावनाओं को भड़काया जाता है, आस्था को साधन बनाया जाता है और जनता को धीरे-धीरे इस भ्रम में डाला जाता है कि यही सच्चा धर्म है।
यह लोग इतने शातिर हैं कि बड़े व्यापारीयो से मोटी रकम लेकर आगे सोफे पर बिराजमान करा देते हैं और वह अपने आप को सबसे बड़ा दानवीर समझ कर फूला नहीं समाता है।
इस दिखावे का असर इतना गहरा होता है कि समाज में एक तरह की होड़ लग जाती है—कौन ज्यादा दान देगा, कौन मंच के सबसे आगे बैठेगा, और किसका नाम सबसे ज्यादा बार उद्घोषित होगा !!
धर्म के नाम पर यह प्रतिस्पर्धा अब सेवा नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का बाजार बन चुकी है।
और जो मीडियम क्लास के लोग है उन्हें इस कथा से होने वाले फायदे जैसे कि- कर्ज़ मुक्ति, व्यापार में तरक्की, बीमारी ठीक होना आदि आदि… बता देते हैं और अंधभक्त मान भी लेते हैं।
यहां सबसे बड़ा खेल मनोविज्ञान का है, जहां एक परेशान व्यक्ति को उसकी कमजोरी के समय पकड़कर उसे ऐसे सपने दिखाए जाते हैं जो सुनने में आसान और आकर्षक लगते हैं, लेकिन हकीकत में उनका कोई आधार नहीं होता। “धर्म”…विज्ञान और कर्म का विरोध नहीं करता,बल्कि कर्म को ही सर्वोपरि मानता है।
इसीलिए “श्री रामचरितमानस” में लिखा है कि, जब लक्ष्मण जी को मेघनाथ के द्वारा शक्ति लग गई तो ,भगवान राम ने कोई टोटक टमना या कथा नहीं सुनाई, शीघ्र हनुमान जी को भेज कर वैध को बुलाया और वैध के द्वारा बताई हुई (दवाई सजीवन बूटी) लेने के लिए भेज दिया।
इस प्रसंग में छिपा संदेश बहुत स्पष्ट है—समस्या का समाधान कर्म और प्रयास से होता है, न कि भ्रम और अंधविश्वास से।
क्या प्रभु श्री राम टोटके नहीं कर सकते थे?
निश्चित रूप से कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने प्राणी मात्र को संदेश दिया कि अंधभक्ति में नहीं पड़ना और कर्म रूपी पुरुषार्थ करना पड़ेगा।
भाइयों कर्ज़ मुक्ति या किसी भी परेशानी से झुटकारा पाने के लिए आपको ईमानदारी से कर्म करना पड़ेगा और वैसे भी श्री रामचरितमानस में लिखा है—
चौपाई:
“कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।”
अर्थ:
ईश्वर ने इस दुनिया को कर्म के आधार पर बनाया है। जैसे कोई व्यक्ति कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
भावार्थ:
कर्म ही भाग्य है: मनुष्य के भाग्य का निर्माण उसके अपने कर्मों से ही होता है, न कि टोने टोटके करने से।
लेकिन भीलवाड़ा में हो रहा है “अंधी घोड़ी फफूंदे चना देते जाओ भैया घना के घना।”
अर्थ: घोड़ी अंधी है और चने फफूंदीदार है कटोरे भर भर के खिला दो घोड़ी तो देख ही नहीं सकती।
यानी स्थिति यह हो चुकी है कि सत्य सामने होते हुए भी लोग उसे देखने को तैयार नहीं हैं, और इसी अंधेपन का फायदा उठाकर कुछ लोग लगातार अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं।
वाह रे….”धर्म के ठेकेदारों” भीलवाड़ा को लूटने का अच्छा कारोबार चला रखा है।
यह कारोबार इतना व्यवस्थित हो चुका है कि इसमें आयोजन, प्रचार, भीड़ प्रबंधन, दान संग्रह—सब कुछ एक सिस्टम के तहत चलता है, मानो कोई उद्योग चल रहा हो।
इन मूर्खों को शहर का विकास करने के लिए नहीं सूझती ।आज भीलवाड़ा शहर के हालात यह है कि, चारों तरफ गली मोहल्लों में टूटी सड़के पड़ी है और जगह जगह गंदगी के ढेर है, आवारा पशु सड़कों, और मुख्य बाजारों में घूम रहे है, जिससे आम आदमी दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है , भीलवाड़ा विकास में जीरो है। यह विडंबना ही है कि जहां करोड़ों रुपये धार्मिक आयोजनों में बहाए जा रहे हैं, वहीं शहर की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
अरे भीलवाड़ा के धर्म धुरंधर दानवीरों.. आपकी मेहनत से कमाए हुए पैसों को सत्कर्म में लगाओ—
कुंवारी गरीब कन्याओं का विवाह कराओ, बेसहारों को सहारा दो, बीमारों का इलाज कराओ, अपने शहर के विकास पर अपने देश के विकास पर खर्च करो, शिक्षा पर खर्च करो।
यही सच्चा धर्म है, यही मानवता है, और यही वह मार्ग है जो समाज को आगे ले जाता है।
हर घर में हमारे ग्रंथों का, धार्मिक पुस्तकों का वितरण करो , जिससे कि आने वाली पीढ़ी हमारे धर्म सनातन के बारे में जाने और जिन योद्धाओं, मनीषियों ने भारत के लिए बलिदान दिया उन के बारे में जाने, जिससे कि तुम्हारी धर्म की जड़ पाताल तक गहरी हो जाएगी।
इन पाखंडियों और धूर्त नेताओं के चक्कर में मत पड़ो।
समय आ गया है जागने का, सोचने का और सही-गलत में फर्क करने का।
आज जरूरत है अंधभक्ति से बाहर निकलने की, धर्म को समझने की और कर्म को अपनाने की।
वरना यह खेल यूं ही चलता रहेगा…
और जनता सिर्फ दर्शक बनी रह जाएगी। और यह व्यंग सही हो जाएगा
महाराज किल्बिस की जय हो… अंधेरा कायम रहे!

 

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