“बाबाओं” की एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ , या जनता के साथ लूट : बाबाओं, कथावाचकों और नेताओं के मकड़जाल में फंसी भीलवाड़ा की जनता..
(पत्रकार) राजेंद्र शर्मा ✍️
भीलवाड़ा “वस्त्र नगरी” के साथ-साथ “धर्म नगरी” के नाम से भी जानी जाती है । यह शहर वर्षों से अपनी धार्मिक आस्था, मंदिरों, सत्संगों और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। लेकिन पिछले कुछ समय से इस धर्म नगरी की पवित्र छवि पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा होता नजर आ रहा है। शहर के कुछ बाबाओं के बीच अब भक्ति या सेवा की नहीं, बल्कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है।
अगर एक बाबा किसी बड़े कथावाचक का आयोजन करा देता है, तो दूसरा बाबा उससे बड़ी कथा आयोजन का प्रोग्राम छेड़ देता है। यह होड़ अब भक्ति से अधिक दिखावे और प्रभाव जमाने की लड़ाई बन चुकी है।
नेता जी भी कहां पीछे रहने वाले , क्योंकि उन्हें सनातनवादी और धार्मिक बन कर अपने वोट बैंक बनाने की जुगाड़ मिल जाती है। राजनीति और धर्म का यह मेल अब एक ऐसा मंच बन गया है जहां आस्था का उपयोग भावनात्मक निवेश के रूप में किया जा रहा है।
बस फिर क्या था! बाबा, नेता और बड़ी दुकान चलाने वाले कथावाचक मिलकर, शहर की आम जनता को लूटने का खेल चालू कर देते हैं। बड़े आयोजनों में शहर के करोड़ों रुपए लग जाते हैं । जिसमें विशालकाय मंच, भव्य टेंट, साउंड सिस्टम, प्रचार-प्रसार और कथाकार से तय की हुई मोटी रकम शामिल होती है।
सूत्रों से पता चला है कि अभी जो आयोजन हो रहा है उसमें 8 से 10 करोड़ रुपए खर्च होने हैं। इससे पहले जो बड़ी कथा का आयोजन हुआ था, उसमें लगभग 5 से 6 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।
काश… इतना पैसा अगर हमारे शहर भीलवाड़ा के विकास पर खर्च होता तो देश में सबसे सुंदर सिटी के रूप में हमारा शहर जाना जाता। या फिर जो परिवार सक्षम नहीं है, ऐसे परिवारों की कन्याओं का विवाह होता, असहाय लोगों के इलाज में खर्च होता, तो इन दानदाताओं की धर्म की जड़ बहुत मजबूत हो जाती।
और हर समाज तबके में ऐसे लोगों का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता। लेकिन धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले लोग इन दानदाताओं का ब्रेनवॉश ऐसा करते हैं कि, खुशी-खुशी इस गोरख धंधे के लिए अपना पैसा दे देते हैं। क्योंकि ऐसे लोगों को पता है कि धर्म के नाम पर लोगों को आसानी से प्रभावित किया जा सकता है।
उसी का फायदा उठाकर भीलवाड़ा की जनता को अपने मकड़जाल में फंसा लेते हैं।
जबकि देखा जाए तो ना कथा करने वाला, ना कथा सुनने वाला, अपने जीवन में उन प्रेरणादायक कथाओं में जो लिखा है उसका एक सूत्र भी अपने जीवन में नहीं उतारता है।
अगर अपने जीवन में उन पुराणों से, उन कथाओं से, एक सूत्र भी अपने जीवन में उतार ले तो जीवन आनंदमय और भक्ति में सराबोर हो सकता है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
जब तक कथा चलती है, लोग लच्छेदार कहानियों, चुटकुलों और भावनात्मक प्रस्तुतियों का आनंद लेते हैं, लेकिन कथा समाप्त होते ही धर्म, आचरण और आदर्श जीवन की बातें भूल जाते हैं।
रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड (दोहा 99-100) में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि कलियुग में नैतिक पतन किस प्रकार होगा।
चौपाई:
“सोइ सयान जो परधन हारी।
जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
अर्थ: जो व्यक्ति झूठ बोलना और दिखावा करना जानता है, कलियुग में वही सबसे चतुर और गुणवान माना जाएगा।
तात्पर्य:
गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं कि कलियुग में झूठ, दिखावा और कपट करने वाले लोगों को ही समझदार माना जाएगा।
कलियुग के लक्षण:
परधन हारी: दूसरे का धन हड़पने वाला चतुर कहलाएगा।
दंभ आचारी: पाखंडी व्यक्ति को आचार्य माना जाएगा।
झूठई भोजन: झूठ जीवन का आधार बन जाएगा।
जो हमारे ऋषि-मुनि हजारों साल पहले लिख कर गए, वह आज के समय में सच साबित होता दिखाई दे रहा है।
हमारे भारत की सनातन परंपरा को बनाए रखने के लिए महान विभूतियों ने कभी झूठ या लूट का सहारा नहीं लिया। उन्होंने अपना सर्वस्व धर्म और समाज के लिए समर्पित कर दिया।
जैसे —
आदि शंकराचार्य
छत्रपति शिवाजी महाराज
स्वामी विवेकानंद
गुरु तेग बहादुर
महर्षि दयानंद सरस्वती
रामानुजाचार्य
इन महान मनीषियों ने कठिन समय में धर्म, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा की।
आज कथाओं की वास्तविक जरूरत उन क्षेत्रों में है जहां लोग संस्कारों से दूर हो रहे हैं या धर्म परिवर्तन जैसी स्थितियों का सामना कर रहे हैं। वहां कथा, ज्ञान और सही दिशा की आवश्यकता है।
लेकिन ऐसे बाबा और कथाओं के ठेकेदार वहां नहीं जाएंगे, क्योंकि वहां उन्हें धन नहीं मिलेगा, सम्मान नहीं मिलेगा, और शायद संघर्ष करना पड़ेगा।
वहां सच्ची सेवा और त्याग की जरूरत होगी — और यही वह चीज है जिससे ये लोग बचते हैं।
ऐसे आयोजनों से पुलिस और प्रशासन भी होता परेशान:
जब बड़े नेता इन आयोजनों में शामिल होते हैं, तो पूरा प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हो जाता है। लाखों की भीड़ को संभालना, सुरक्षा व्यवस्था करना, यातायात नियंत्रित करना — यह सब पुलिस और प्रशासन के लिए भारी चुनौती बन जाता है।
इसमें प्रशासन का अमूल्य समय और संसाधन खर्च होते हैं, जो अन्य जनहित कार्यों में लग सकते थे।
समाधान क्या है?
हमें स्वयं समझना होगा कि आडंबर और दिखावे से दूर रहना ही सच्चा धर्म है।
हमें नियमित रूप से अपने परिवार के साथ मंदिर जाना चाहिए, घर में धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना चाहिए जैसे —
रामचरितमानस
श्रीमद्भगवद्गीता
और अपने बच्चों, महिलाओं व परिवारजनों को इनका अर्थ समझाना चाहिए।
ताकि आने वाली पीढ़ी केवल दिखावे की भक्ति नहीं, बल्कि सच्चे संस्कारों से जुड़ी भक्ति को अपनाए।
हमें अपने ऋषियों, संतों और उन वीरों को जानना होगा जिन्होंने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
तभी हम इस मकड़जाल से बाहर निकल पाएंगे और सच्चे अर्थों में धर्म को समझ पाएंगे।
यह मेरे स्वयं के विचार है।✍️ राजेंद्र कुमार शर्मा (स्वतंत्र पत्रकार)

