PST Gems कंपनी की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में मानहानि का दावा दायर किए जाने का मामला…
भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने जताया विरोध, कहा- पत्रकारों को डराकर जनहित के सवालों से नहीं रोका जा सकता…
गौरव रक्षक/ न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली, 3नवंबर 2026
लोकतंत्र में पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व सत्ता, व्यवस्था और संस्थानों से सवाल पूछना तथा जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है। लेकिन जब किसी खबर या खुलासे के बाद पत्रकार को करोड़ों रुपये के मानहानि मुकदमे का सामना करना पड़े, तो यह मामला केवल एक पत्रकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
ऐसा ही एक मामला इन दिनों चर्चा में है। ‘सच की रफ्तार’ समाचार पत्र एवं डिजिटल न्यूज चैनल के संपादक तथा भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष धर्मवीर जारवाल के अनुसार, PST Gems नामक कंपनी ने उनके मीडिया संस्थान के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में 5 करोड़ रुपये का मानहानि दावा दायर किया है। इस घटनाक्रम को लेकर देश के पत्रकार जगत में चिंता व्यक्त की जा रही है।
दवा को लेकर शिकायत से शुरू हुआ विवाद
धर्मवीर जारवाल द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, इस विवाद की शुरुआत अधिवक्ता मोहित की ओर से ड्रग विभाग में की गई एक शिकायत से हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि PSTGems Private Limited (Positive Gems) की ओर से Tadalafil नामक एलोपैथिक दवा को आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में बेचा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि Tadalafil एक शेड्यूल-H श्रेणी की दवा है।
इस शिकायत और उससे जुड़े सवालों को लेकर ‘सच की रफ्तार’ सहित कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरें प्रकाशित एवं प्रसारित की गईं। इन खबरों में उत्पाद की प्रकृति, उसकी बिक्री और आम उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर सवाल उठाए गए।
कॉपीराइट स्ट्राइक के बाद 5 करोड़ का मानहानि दावा
धर्मवीर जारवाल का दावा है कि खबरों के प्रसारण के बाद उनके यूट्यूब चैनल पर 14 से अधिक कॉपीराइट स्ट्राइक की गईं, जिससे चैनल को बंद होने का खतरा पैदा हो गया था। उनके मुताबिक, बाद में यूट्यूब ने संबंधित कॉपीराइट शिकायतों को हटाते हुए वीडियो दोबारा उपलब्ध करा दिए।
इसके बाद कंपनी की ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में 5 करोड़ रुपये का मानहानि दावा दायर किया गया। जारवाल का आरोप है कि इस प्रकार की कानूनी कार्रवाई पत्रकारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बनाने का माध्यम बन सकती है।
हालांकि, मानहानि मामले में कंपनी का पक्ष और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दलीलें भी महत्वपूर्ण हैं। मामले में अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने जताया कड़ा विरोध
इस प्रकरण पर देश के पत्रकार संगठन भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) ने चिंता और नाराजगी जाहिर की है। संगठन ने इसे खोजी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश बताते हुए पत्रकार धर्मवीर जारवाल के समर्थन में आवाज उठाई है।
संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक पांडे ने कहा कि सीमित संसाधनों में काम करने वाला पत्रकार अभावों के बावजूद आम जनता की आवाज उठाता है। यदि ऐसे पत्रकारों को कोर्ट-कचहरी और मुकदमों के माध्यम से प्रताड़ित किया जाएगा, तो यह बेहद निंदनीय है। उन्होंने कहा कि संगठन पत्रकारों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ा रहेगा।
राष्ट्रीय संगठन सचिव गिरिधर शर्मा ने कहा कि कानूनी दांव-पेचों के जरिए पत्रकारों की आवाज को चुप कराने की कोशिश उचित नहीं है।
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शैलेश्वर पांडा ने सवाल उठाया कि जब पत्रकार जनहित के मुद्दे उठाते हैं, तब उन्हें सम्मान के बजाय कानूनी नोटिस और मुकदमों का सामना क्यों करना पड़ता है?
वहीं, संगठन के संस्थापक शहनवाज हसन ने कहा कि पत्रकारों का शोषण लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पत्रकारों की आवाज को मुकदमों के जरिए दबाने की कोशिशों का संगठन विरोध करेगा।
देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने कहा है कि वह धर्मवीर जारवाल से जुड़े इस मामले को कानूनी और सामाजिक स्तर पर उठाएगा। संगठन ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि पत्रकारों की स्वतंत्रता पर इस तरह के हमले जारी रहे, तो देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या आर्थिक दबाव से रुकेगी खोजी पत्रकारिता?
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जनहित से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के लिए करोड़ों रुपये के मानहानि मुकदमे एक डर का कारण बनेंगे? लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदार और तथ्यपरक पत्रकारिता भी है।
किसी भी कंपनी या संस्थान को अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार है, लेकिन पत्रकारों को भी जनहित में सवाल पूछने और तथ्यों के आधार पर खबर प्रकाशित करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
अब सभी की निगाहें दिल्ली उच्च न्यायालय की कार्यवाही पर टिकी हैं। यह मामला केवल 5 करोड़ रुपये के दावे का नहीं, बल्कि इस बात की भी परीक्षा है कि लोकतंत्र में जनहित के सवालों और स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका कितनी मजबूत बनी रहती है।

