“आंदोलन नहीं”, जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता का विस्फोट है यह.. जब विधायक-सांसद मौन हों, तब आंदोलन ही जनता की आवाज़ बनता है..

“आंदोलन नहीं”, जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता का विस्फोट है यह.. जब विधायक-सांसद मौन हों, तब आंदोलन ही जनता की आवाज़ बनता है..

गौरव रक्षक/ लेख: राजेंद्र कुमार शर्मा

30 जुलाई 2026

आख़िर आंदोलनों की बाढ़ क्यों आई?

आज देश का शायद ही कोई ऐसा जिला बचा हो जहाँ धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, चक्काजाम या आंदोलन न हो रहा हो। किसानों को सड़क पर उतरना पड़ता है, युवाओं को रोजगार के लिए आंदोलन करना पड़ता है, महिलाएँ सुरक्षा और न्याय के लिए प्रदर्शन करती हैं, कर्मचारी अपनी मांगों के लिए धरना देते हैं और आम नागरिक पानी, बिजली, सड़क और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए प्रशासन के दरवाज़े खटखटाते रहते हैं।
सवाल यह है कि यदि हर समस्या का समाधान आंदोलन से ही होना है, तो फिर सांसद और विधायक किसलिए चुने जाते हैं?
लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे उसकी आवाज़ संसद और विधानसभा तक पहुँचाएँ, सरकार से जवाब मांगें और जनता के अधिकारों की लड़ाई सदन के भीतर लड़ें। लेकिन जब यही काम जनता को सड़कों पर उतरकर करना पड़े, तब यह केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।
हर आंदोलन की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। आम आदमी का समय बर्बाद होता है, व्यापार प्रभावित होता है, सरकारी मशीनरी आंदोलन संभालने में लग जाती है और विकास के कार्य पीछे छूट जाते हैं। यदि जनप्रतिनिधि समय पर जनता की समस्याएँ उठाएँ, तो शायद अधिकांश आंदोलनों की नौबत ही न आए।
सबसे बड़ा सवाल जनता से भी है। क्या आपने कभी अपने सांसद या विधायक से पूछा कि आपने हमारी समस्या विधानसभा या संसद में कितनी बार उठाई? हमारे क्षेत्र के लिए क्या किया? चुनाव के समय किए गए वादों का क्या हुआ?
चुनाव जीतने के बाद जनता से दूरी बना लेना और केवल उद्घाटन, स्वागत समारोह तथा राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित रह जाना जनप्रतिनिधित्व नहीं है। जनता ने किसी को विशेषाधिकार भोगने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आवाज़ बनने के लिए चुना है।
लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं। इसलिए जनता को सवाल पूछने से डरना नहीं चाहिए। जब तक जनता अपने प्रतिनिधियों से जवाब नहीं मांगेगी, तब तक समस्याओं का बोझ जनता के कंधों पर और सत्ता का सुख कुछ लोगों के हिस्से में ही रहेगा।
अब समय आ गया है कि जनता हर आंदोलन से पहले अपने सांसद और विधायक से जवाब मांगे—क्या आपने हमारी समस्या सरकार तक पहुँचाई? क्या आपने सदन में हमारी आवाज़ उठाई? यदि नहीं, तो आपकी प्राथमिकता क्या रही?
जनप्रतिनिधियों को भी आत्ममंथन करना होगा। जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। यदि जनता को हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए सड़क पर उतरना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
आंदोलन किसी भी समाज की पहली पसंद नहीं होते, वे व्यवस्था की विफलता का अंतिम संकेत होते हैं। जिस दिन जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी और सक्रियता से निभाने लगेंगे, उस दिन सड़कों पर भीड़ नहीं, लोकतंत्र की मजबूती दिखाई देगी।

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