शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या और उद्यमशीलता की धरती है : राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या और उद्यमशीलता की धरती है : राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

शेखावाटी साहित्य संगम में भारतीय ज्ञान परंपरा, लोक संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर रखे विचार

गौरव रक्षक/ राजेंद्र शर्मा

सीकर, 9 अक्टूबर2026

राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या, शौर्य और उद्यमशीलता की गौरवशाली धरती है। देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र का ऐतिहासिक योगदान रहा है। यहां अनेक परिवारों की तीसरी और चौथी पीढ़ी भी देश की रक्षा में अपना योगदान दे रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की धड़कन है और साहित्यिक आयोजन विचारों के परिष्कार, ज्ञानवृद्धि तथा नवीन विचारों के संचार का सशक्त माध्यम हैं।

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे शुक्रवार को सीकर में आयोजित शेखावाटी साहित्य संगम में संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य, लोक संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था और विकसित भारत के संकल्प जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।

साहित्य समाज की धड़कन, सृजन में मर्यादा जरूरी

राज्यपाल ने कहा कि साहित्य केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की चेतना और संवेदनाओं का प्रतिबिंब भी है। साहित्य सृजन के दौरान संयम और मर्यादा का ध्यान रखना आवश्यक है। शेखावाटी साहित्य संगम लोक संस्कृति और साहित्य का ऐसा महत्वपूर्ण मंच है, जो समाज में सकारात्मक विचारों के प्रसार और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा का विश्वभर में रहा है महत्व

भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि महाभारत और रामायण जैसे महान ग्रंथों का अध्ययन विदेशों में भी किया जाता है। वेदों का जर्मन भाषा में अनुवाद हुआ है और भारतीय उपनिषदों में निहित ज्ञान का महत्व सदियों से बना हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत ने ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में विश्व को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। शून्य की अवधारणा ने गणना की पद्धति को नई दिशा प्रदान की और भारतीय ज्ञान परंपरा ने वैश्विक बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लोकगीतों में रची-बसी है राजस्थान की वीर परंपरा

राज्यपाल ने राजस्थान की लोक संस्कृति और लोक साहित्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहां लोकगीतों और लोक परंपराओं के माध्यम से बच्चों में बचपन से ही मातृभूमि के प्रति समर्पण, वीरता और त्याग के संस्कार विकसित किए जाते हैं।

उन्होंने राजस्थान की प्रसिद्ध लोकपंक्तियों ‘इला न देणी आपणी, हालरियो हुलराय, पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई मांय’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पंक्तियों में मातृभूमि की रक्षा, स्वाभिमान और बलिदान की भावना सशक्त रूप से अभिव्यक्त होती है। राजस्थान की लोक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और राष्ट्रीय कर्तव्यों से जोड़ने का कार्य करती हैं।

भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था विकसित करने पर जोर

राज्यपाल ने गीताप्रेस, गोरखपुर की स्थापना में हनुमान प्रसाद पोद्दार के योगदान का उल्लेख करते हुए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारतीय परिस्थितियों, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी स्कूली शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि उनमें नैतिकता, विवेक, समझदारी और अच्छे संस्कारों का विकास करना भी होना चाहिए। ऐसी शिक्षा ही जिम्मेदार नागरिकों के निर्माण और राष्ट्र की प्रगति में प्रभावी योगदान दे सकती है।

2047 तक विकसित भारत बनाने में प्रत्येक नागरिक की भूमिका अहम

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रत्येक नागरिक को अपने-अपने क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। राष्ट्र निर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता आवश्यक है। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाकर ही विकसित भारत के संकल्प को साकार किया जा सकता है।

कई गणमान्यजन रहे उपस्थित

शेखावाटी साहित्य संगम में शेखावाटी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. युद्धवीर सिंह, सेंटर फॉर इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस, तकनीकी शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार के निदेशक अविनाश सिंह पंवार, जिला कलेक्टर आशीष मोदी, पुलिस अधीक्षक संजीव नैन सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।

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