राजनैतिक महासंग्राम राजस्थान चुनाव में कांग्रेस – बीजपी की चयन प्रक्रिया में अंतर, एक आंकलन

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राजनैतिक महासंग्राम

राजस्थान चुनाव में कांग्रेस – बीजपी की चयन प्रक्रिया में अंतर,
एक आंकलन
बीजेपी द्वारा जारी राजस्थान की पहली सूची में 41 नाम है। ये सूची कई सर्वे और रणनीतिक सोच के साथ जारी की गई। 40 कमजोर हारी हुई सीटे साधने के प्रयोग किये गए, सांसद उतारे गए, केंद्रीय नेतृत्व की मजबूती दिखाई गई, पार्टी लाइन तय की गई, और बग़ावतियो को मनाने का पर्याप्त समय मिलना तय किया गया। पूर्व मुख्यमंत्री तक का टिकट रोका गया। पूरा फीडबैक ले कर ही निर्णय लिए जा रहे है। आगे भी सूचियां जारी करने की व्यवस्थित कवायद होना तय लग रहा है। इसी रणनीति पर चल कर बीजेपी 150 से अधिक सीटे जीतने का सपना देख रही है। न धन बल की कमी है, न अनुभवी नेताओ की, न कमल के चाहने वालो की। 5 साल बाद सत्ता बदलने का ट्रेंड भी भाजपा कार्यकर्ताओ में जोश भर रहा है। 40 हारी सीटों पर टिकट जारी कर बीजेपी ने बगावत की भी थाह ले ली है। मोदी शाह व्यवस्थित कैंपेन कर रहे है। तैयारी अच्छी दिख रही है, और आगे आने वाली सूचियों की स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। वैसे भी 60 सीटे भाजपा का गढ़ मानी जा रही है। जहां वे 2 बार लगातार जीते है। शेष 100 सीटों पर भी गहन सर्वे बाद पैनल तैयार हुए है। अब ये तय सा लग रहा है कि बीजेपी कार्यकारणी में हुए निर्णयो के खिलाफ कोई बड़ा नेता खुल कर खड़ा नही होगा। बस वसुंधरा को साधना शेष है, और राजस्थान भगवा रंग में रंग जाएगा। वसुंधरा भी संयम रखें हुए है। इसलिए बीजेपी का राजस्थान में पलड़ा अभी से भारी दिखाई पड़ रहा है।
वही दूसरी ओर कांग्रेस के क्षत्रपों की अलग अलग रणनीति है, जिससे पहली सूची तक जारी नही हो पा रही है। गहलोत ने अपने स्तर पर सर्वे करवाये है, और आलाकमान ने भी। गहलोत की सूची को प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा, प्रभारी रंधावा और चयन समिति अध्यक्ष गोगोई तक का समर्थन है। जिसमे उन सभी विश्वासपात्रों के नाम है जो गहलोत की योजनाओं का गुणगान कर जीतना चाहते है और गहलोत को ही फिर से मुख्यमंत्री देखना चाहते है। गहलोत की कवायद उन्ही स्वामीभक्तो को मैदान में उतारने की है, जो उनसे जुड़े है, चाहे वे हाईकमान की सर्वे की सूची में हो या नही। वे संकट के साथी धारीवाल को जिता कर फिर मंत्री बनाना चाहते है, और जिताऊ विधायको को पहली सूची में ही टिकट दिलाना चाहते है। यदि सोनिया बीच मे न आती तो शायद गहलोत की रणनीति सफल भी ही जाती। इससे लगता है कि इस बार आलाकमान मजबूत हुआ है, और सत्ता की चाबी अपने पास ही रखना चाहता है। इस बिंदु पर गहलोत अब बेबस नजर आ रहे है। वे जानते है कि धारीवाल का टिकट कटना शुरुआत भर है, आगे और भी नाम कटेंगे।
पायलट गुट छोटा है, और 25 सितम्बर को इस्तीफा देने वाला हर क्षत्रप उन्हें अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। वैसे पायलट ने पिछले एक साल में काफी परिपक्वता दिखाई है, और आलाकमान का भरोसा जीता है, पर राजस्थान कांग्रेस में गहलोत ने उन्हें अलग थलग करने का हर प्रयास किया है। नाकारा निकम्मा तक कहा है।
इस्तीफा देने वाले विधायक हो या पुराने कांग्रेसी नेता, सभी सोचते है कि पायलट के हाथ मे कमान आते ही उनके बुरे दिन शुरू हो जाएंगे। इसी कारण पायलट को आलाकमान के लाडले होने के बाद भी राजस्थान कांग्रेस में सहज स्वीकार नही किया जा रहा। गहलोत गुट उनके प्रति काफी हमलावर रहा है। पायलट बार बार समझा रहे है कि उनका मानेसर विद्रोह गहलोत की कार्यशैली के विरुद्ध था, पर 25 सितम्बर का गहलोत गुट का विद्रोह हाईकमान के विरुद्ध था । खरगे सिर्फ कांग्रेस परंपरा अनुसार एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने आये थे, जो कांग्रेस परम्परा है। परंतु सब व्यर्थ। पायलट की ताजपोशी की सुगबुगाहट ने गहलोत गुट से ऐतिहासिक बगावत करवा दी। अभी भी गहलोत गुट का सारा ध्यान पायलट को रोकने पर लगा है। राहुल उन्हें भी एसेट मानते है और उनके कुछ साथी मंत्री भी बने, पर अभी भी
गहलोत का पूरा प्रयास है कि पायलट को टिकट वितरण में कम से कम तवज्जो मिले।
अब देखना यही है कि गहलोत की सूची के कितने उम्मीदवार टिकट पाएंगे, और आलाकमान की सूची के बाकी उम्मीदवारो के प्रति गहलोत की क्या रणनीति होगी? गहलोत की अब तक कि रणनीति तो यही रही है कि 100 सीटो तक ही जीती जाए, जिससे जोड़ तोड़ सम्भव हो सके, बाकी सीटे हार भी जाये तो गम नही। *यदि कांग्रेस 2018 में 120 सीटे जीती होती तो पायलट ही मुख्यमंत्री होते*।
इस बार भी गहलोत की रणनीति 100 सीटों की ही है। इसके अलावा 10 निर्दलीय, और कुछ बसपा जैसे दलों के विधायक जीते तो सेहरा फिर बन्ध जाएगा। सँगठन का ढांचा भी कांग्रेस का बिखरा पड़ा है, और कार्यकर्ता भी हताश है।
कांग्रेस में अब लड़ाई गहलोत vs आलाकमान हो चली है । गहलोत जानते है कि दिल्ली दरबार की नाराजगी से न जाने कितने कांग्रेसी नेपथ्य में चले गए, और अबकी बार वे गांधी परिवार के निशाने पर है। पर ये गहलोत की ही काबिलियत है कि वे राजस्थान कांग्रेस के काफी बड़े गुट के नेता बने हुए है, और आलाकमान तक पर दबाव कायम रखे हुए है। इस्तीफे दिलवा कर एक साल तक लम्बित रखे गए और आलाकमान को दवाब में रखा गया। इतनी हिमाकत सिर्फ गहलोत के बस की बात है।
देखना यही होगा कि पुरानी स्वामी भक्ति और जादूगरी के बल पर गहलोत कांग्रेस आलाकमान का कितना विश्वास जीतते है और कितने टिकट पाते है। वे 3 महीने से सूची जारी करवाने की कोशिश में है। पर अब पेंच उस बगावत पर फंसा है, जिससे आलाकमान को सख्त नफरत है। यही नाराजगी गहलोत पर अब भारी पड़ रहा है। कांग्रेस की सूची मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मणिपुर में निरंतर आ रही है, पर राजस्थान का रण अलग है। सोनिया का बैठना और टोकना बड़ी बात है। गहलोत की राह आसान नही है।
यही अंतर है कांग्रेस और भाजपा की सूचियों में क़ि केंद्रीय नेतृत्व भाजपा में अधिक ताकतवर बना हुआ है, परंतु कांग्रेस आलाकमान ज्यादा फूक फूक कर कदम रख रहा है। गहलोत यदि कांग्रेस को जीतने की स्थिति में नही लग रहे हो तो भी अपने विरोधी गुट के कांग्रेस उम्मीद्वार को हरवाने की स्थिति में तो आज भी है। वैसे कांग्रेस आलाकमान को भी राजस्थान से उम्मीद कम है, पर जो भी हो, ये चुनाव गहलोत के लिए अस्तित्व की लड़ाई साबित होंगे।
बसपा, बेनीवाल और बगावत कर खड़े निर्दलीय भी कई सीटो पर अपना प्रभाव दिखाएंगे, पर अभी तो राजस्थान की जनता कांग्रेस बीजेपी की सूचियों का बेसब्री से इन्तेजार ही कर रही है।

राजस्थान चुनाव में कांग्रेस – बीजपी की चयन प्रक्रिया में अंतर,एक आंकलन

बीजेपी द्वारा जारी राजस्थान की पहली सूची में 41 नाम है। ये सूची कई सर्वे और रणनीतिक सोच के साथ जारी की गई। 40 कमजोर हारी हुई सीटे साधने के प्रयोग किये गए, सांसद उतारे गए, केंद्रीय नेतृत्व की मजबूती दिखाई गई, पार्टी लाइन तय की गई, और बग़ावतियो को मनाने का पर्याप्त समय मिलना तय किया गया। पूर्व मुख्यमंत्री तक का टिकट रोका गया। पूरा फीडबैक ले कर ही निर्णय लिए जा रहे है। आगे भी सूचियां जारी करने की व्यवस्थित कवायद होना तय लग रहा है। इसी रणनीति पर चल कर बीजेपी 150 से अधिक सीटे जीतने का सपना देख रही है। न धन बल की कमी है, न अनुभवी नेताओ की, न कमल के चाहने वालो की। 5 साल बाद सत्ता बदलने का ट्रेंड भी भाजपा कार्यकर्ताओ में जोश भर रहा है। 40 हारी सीटों पर टिकट जारी कर बीजेपी ने बगावत की भी थाह ले ली है। मोदी शाह व्यवस्थित कैंपेन कर रहे है। तैयारी अच्छी दिख रही है, और आगे आने वाली सूचियों की स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। वैसे भी 60 सीटे भाजपा का गढ़ मानी जा रही है। जहां वे 2 बार लगातार जीते है। शेष 100 सीटों पर भी गहन सर्वे बाद पैनल तैयार हुए है। अब ये तय सा लग रहा है कि बीजेपी कार्यकारणी में हुए निर्णयो के खिलाफ कोई बड़ा नेता खुल कर खड़ा नही होगा। बस वसुंधरा को साधना शेष है, और राजस्थान भगवा रंग में रंग जाएगा। वसुंधरा भी संयम रखें हुए है। इसलिए बीजेपी का राजस्थान में पलड़ा अभी से भारी दिखाई पड़ रहा है।
वही दूसरी ओर कांग्रेस के क्षत्रपों की अलग अलग रणनीति है, जिससे पहली सूची तक जारी नही हो पा रही है। गहलोत ने अपने स्तर पर सर्वे करवाये है, और आलाकमान ने भी। गहलोत की सूची को प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा, प्रभारी रंधावा और चयन समिति अध्यक्ष गोगोई तक का समर्थन है। जिसमे उन सभी विश्वासपात्रों के नाम है जो गहलोत की योजनाओं का गुणगान कर जीतना चाहते है और गहलोत को ही फिर से मुख्यमंत्री देखना चाहते है। गहलोत की कवायद उन्ही स्वामीभक्तो को मैदान में उतारने की है, जो उनसे जुड़े है, चाहे वे हाईकमान की सर्वे की सूची में हो या नही। वे संकट के साथी धारीवाल को जिता कर फिर मंत्री बनाना चाहते है, और जिताऊ विधायको को पहली सूची में ही टिकट दिलाना चाहते है। यदि सोनिया बीच मे न आती तो शायद गहलोत की रणनीति सफल भी ही जाती। इससे लगता है कि इस बार आलाकमान मजबूत हुआ है, और सत्ता की चाबी अपने पास ही रखना चाहता है। इस बिंदु पर गहलोत अब बेबस नजर आ रहे है। वे जानते है कि धारीवाल का टिकट कटना शुरुआत भर है, आगे और भी नाम कटेंगे।
पायलट गुट छोटा है, और 25 सितम्बर को इस्तीफा देने वाला हर क्षत्रप उन्हें अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। वैसे पायलट ने पिछले एक साल में काफी परिपक्वता दिखाई है, और आलाकमान का भरोसा जीता है, पर राजस्थान कांग्रेस में गहलोत ने उन्हें अलग थलग करने का हर प्रयास किया है। नाकारा निकम्मा तक कहा है।
इस्तीफा देने वाले विधायक हो या पुराने कांग्रेसी नेता, सभी सोचते है कि पायलट के हाथ मे कमान आते ही उनके बुरे दिन शुरू हो जाएंगे। इसी कारण पायलट को आलाकमान के लाडले होने के बाद भी राजस्थान कांग्रेस में सहज स्वीकार नही किया जा रहा। गहलोत गुट उनके प्रति काफी हमलावर रहा है। पायलट बार बार समझा रहे है कि उनका मानेसर विद्रोह गहलोत की कार्यशैली के विरुद्ध था, पर 25 सितम्बर का गहलोत गुट का विद्रोह हाईकमान के विरुद्ध था। खरगे सिर्फ कांग्रेस परंपरा अनुसार एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने आये थे, जो कांग्रेस परम्परा है। परंतु सब व्यर्थ। पायलट की ताजपोशी की सुगबुगाहट ने गहलोत गुट से ऐतिहासिक बगावत करवा दी । अभी भी गहलोत गुट का सारा ध्यान पायलट को रोकने पर लगा है।राहुल उन्हें भी एसेट मानते है और उनके कुछ साथी मंत्री भी बने, पर अभी भी गहलोत का पूरा प्रयास है कि पायलट को टिकट वितरण में कम से कम तवज्जो मिले।
अब देखना यही है कि गहलोत की सूची के कितने उम्मीदवार टिकट पाएंगे, और आलाकमान की सूची के बाकी उम्मीदवारो के प्रति गहलोत की क्या रणनीति होगी? गहलोत की अब तक कि रणनीति तो यही रही है कि 100 सीटो तक ही जीती जाए, जिससे जोड़ तोड़ सम्भव हो सके, बाकी सीटे हार भी जाये तो गम नही। *यदि कांग्रेस 2018 में 120 सीटे जीती होती तो पायलट ही मुख्यमंत्री होते*।
इस बार भी गहलोत की रणनीति 100 सीटों की ही है। इसके अलावा 10 निर्दलीय, और कुछ बसपा जैसे दलों के विधायक जीते तो सेहरा फिर बन्ध जाएगा। सँगठन का ढांचा भी कांग्रेस का बिखरा पड़ा है, और कार्यकर्ता भी हताश है। कांग्रेस में अब लड़ाई गहलोत vs आलाकमान हो चली है । गहलोत जानते है कि दिल्ली दरबार की नाराजगी से न जाने कितने कांग्रेसी नेपथ्य में चले गए, और अबकी बार वे गांधी परिवार के निशाने पर है। पर ये गहलोत की ही काबिलियत है कि वे राजस्थान कांग्रेस के काफी बड़े गुट के नेता बने हुए है, और आलाकमान तक पर दबाव कायम रखे हुए है। इस्तीफे दिलवा कर एक साल तक लम्बित रखे गए और आलाकमान को दवाब में रखा गया। इतनी हिमाकत सिर्फ गहलोत के बस की बात है।
देखना यही होगा कि पुरानी स्वामी भक्ति और जादूगरी के बल पर गहलोत कांग्रेस आलाकमान का कितना विश्वास जीतते है और कितने टिकट पाते है। वे 3 महीने से सूची जारी करवाने की कोशिश में है। पर अब पेंच उस बगावत पर फंसा है, जिससे आलाकमान को सख्त नफरत है। यही नाराजगी गहलोत पर अब भारी पड़ रहा है। कांग्रेस की सूची मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मणिपुर में निरंतर आ रही है, पर राजस्थान का रण अलग है। सोनिया का बैठना और टोकना बड़ी बात है। गहलोत की राह आसान नही है।
यही अंतर है कांग्रेस और भाजपा की सूचियों में क़ि केंद्रीय नेतृत्व भाजपा में अधिक ताकतवर बना हुआ है, परंतु कांग्रेस आलाकमान ज्यादा फूक फूक कर कदम रख रहा है। गहलोत यदि कांग्रेस को जीतने की स्थिति में नही लग रहे हो तो भी अपने विरोधी गुट के कांग्रेस उम्मीद्वार को हरवाने की स्थिति में तो आज भी है । वैसे कांग्रेस आलाकमान को भी राजस्थान से उम्मीद कम है, पर जो भी हो, ये चुनाव गहलोत के लिए अस्तित्व की लड़ाई साबित होंगे। बसपा, बेनीवाल और बगावत कर खड़े निर्दलीय भी कई सीटो पर अपना प्रभाव दिखाएंगे, पर अभी तो राजस्थान की जनता कांग्रेस बीजेपी की सूचियों का बेसब्री से इन्तेजार ही कर रही है।
चुनावी समर है।
आगे आगे देखिए होता है क्या?

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