मोबाइल उठाया और बन गए पत्रकार ? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी—‘हर कोई पत्रकार बनने लगेगा तो बढ़ेंगी मुश्किलें’..
रीलबाजों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका पर अदालत की चिंता, स्वतंत्र पत्रकारों के अधिकारों और सुरक्षा के सवाल पर व्यापक बहस…
गौरव रक्षक/राजेंद्र शर्मा (अधिस्वीकृत पत्रकार, राजस्थान सरकार)
नई दिल्ली, 16 अक्टूबर2026
डिजिटल युग में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने सूचनाओं के आदान-प्रदान को बेहद आसान बना दिया है। आज कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर, घटनाओं को रिकॉर्ड करके और सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करके बड़ी संख्या में लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। लेकिन क्या केवल मोबाइल फोन से वीडियो बनाने या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से कोई व्यक्ति पत्रकार बन जाता है? स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांस पत्रकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और रील बनाने वालों की भूमिका से जुड़े इसी अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गंभीर चर्चा हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को टिप्पणी की कि यदि देश का हर नागरिक पत्रकार बनने लगेगा, तो इससे अन्य लोगों के लिए भी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ की यह टिप्पणी विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले स्वतंत्र एवं फ्रीलांस पत्रकारों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई। इस मामले ने एक बार फिर पत्रकारिता की स्वतंत्रता, पेशेवर पहचान, अभिव्यक्ति की आजादी और सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ती रील संस्कृति के बीच की सीमाओं पर बहस को केंद्र में ला दिया है।
स्वतंत्र पत्रकारों को मान्यता देने का मुद्दा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत के समक्ष दलील दी कि दिल्ली पुलिस विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों को पर्याप्त मान्यता नहीं देती। उनके अनुसार, पुलिस ऐसे पत्रकारों से प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की मान्यता दिखाने पर जोर देती है, जिससे स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पत्रकारों के सामने अपने पेशेवर दायित्व निभाने में कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं।
जयसिंह ने इस समस्या के समाधान के लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल तैयार करने की मांग की। उनका तर्क था कि यदि किसी पत्रकार के पास किसी मीडिया संस्थान की ओर से जारी पहचान पत्र है, तो केवल पीआईबी मान्यता नहीं होने के आधार पर उसे अपना पत्रकारिता संबंधी कार्य करने से नहीं रोका जाना चाहिए।
इस मांग के पीछे मुख्य सवाल यह है कि पत्रकारिता का दायरा केवल मान्यता प्राप्त पत्रकारों या बड़े मीडिया संस्थानों तक सीमित माना जाए अथवा स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पत्रकारों को भी उचित संरक्षण मिले।
‘हर कोई पत्रकार बनने लगेगा, तो समस्याएं खड़ी होंगी’
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान इस विषय पर सावधानी बरतने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा, “अगर हर कोई पत्रकार बनने लगेगा, तो इससे हर दूसरे व्यक्ति के लिए समस्याएं खड़ी होंगी।”
अदालत की इस टिप्पणी ने पत्रकारिता की पहचान और उसके दायरे को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। एक ओर स्वतंत्र पत्रकारों को बिना अनुचित बाधा के घटनाओं की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिलना चाहिए, वहीं दूसरी ओर यह भी विचारणीय है कि पत्रकारिता के नाम पर किसी भी प्रकार की गतिविधि को स्वतः पेशेवर पत्रकारिता का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं।
अदालत की टिप्पणी को पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर अंतिम निर्णय के रूप में नहीं, बल्कि इस जटिल विषय पर विचार करते समय बरती जाने वाली सावधानी के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए।
पत्रकार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रीलबाज—क्या सभी एक ही श्रेणी में आते हैं?
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इस सवाल पर विस्तार से विचार करना होगा कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को पत्रकार बनने का अधिकार भी देता है। उन्होंने इस प्रश्न को आसान नहीं माना।
सुनवाई के दौरान पत्रकारों की विभिन्न श्रेणियों का उल्लेख भी किया गया। इनमें मान्यता प्राप्त पत्रकार, पंजीकृत मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकार, स्वतंत्र एवं फ्रीलांस पत्रकार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वाले लोग शामिल हैं।
आज सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो घटनास्थलों पर पहुंचकर वीडियो बनाते हैं और उन्हें इंटरनेट पर प्रसारित करते हैं। कुछ लोग जनसमस्याओं को सामने लाने, प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने और आम नागरिकों की आवाज उठाने का काम करते हैं। वहीं, कुछ मामलों में वीडियो को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए घटनाओं को सनसनीखेज अंदाज में प्रस्तुत करने की आशंका भी जताई जाती है।
ऐसे में मूल प्रश्न यह है कि वास्तविक पत्रकारिता, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति, सोशल मीडिया सामग्री निर्माण और लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से बनाई जाने वाली रीलों के बीच अंतर कैसे निर्धारित किया जाए।
क्या पत्रकारों को अतिरिक्त सुरक्षा मिलनी चाहिए?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस पहलू पर भी विचार करने की जरूरत बताई कि क्या पत्रकारों की किसी विशेष श्रेणी को अतिरिक्त स्तर की सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति बागची ने वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें भी पत्रकारों की अलग-अलग श्रेणियों का प्रावधान है। उनके अनुसार, अदालत को इस मामले में सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करना होगा।
विरोध-प्रदर्शनों, धरनों और संवेदनशील घटनाओं की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को कई बार कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उनकी सुरक्षा और स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि अतिरिक्त सुरक्षा का लाभ किन लोगों को और किन मानदंडों के आधार पर मिलना चाहिए।
इसका समाधान तलाशते समय पत्रकारों की वास्तविक पेशेवर भूमिका, उनके कार्य की प्रकृति और घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी के उद्देश्य जैसे पहलुओं पर विचार करना आवश्यक होगा।
‘मोबाइल रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को पत्रकार बता सकता है’
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने डिजिटल तकनीक के मौजूदा दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को स्वतंत्र या फ्रीलांस पत्रकार बता सकता है।
उन्होंने दलील दी कि कुछ लोग वास्तविक पत्रकारिता करने के बजाय सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने और पैसे कमाने के उद्देश्य से रील बनाते हैं। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में घटनाओं को एकतरफा तरीके से पेश करने या सनसनीखेज रूप देने की आशंका रहती है।
मेहता ने महिला पत्रकारों को परेशान नहीं किए जाने की आवश्यकता का समर्थन किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यही विचार महिला पुलिसकर्मियों पर भी लागू होना चाहिए।
उनकी दलीलों से यह मुद्दा भी सामने आया कि घटनास्थलों पर काम करने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करते समय सभी संबंधित पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जवाबदेही—दोनों जरूरी
लोकतंत्र में पत्रकारिता को जनहित के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा जाता है। पत्रकार सरकार, प्रशासन और संस्थाओं के कामकाज को जनता के सामने लाने, जनसमस्याओं को उठाने और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर जानकारी उपलब्ध कराने में भूमिका निभाते हैं।
डिजिटल मीडिया के विस्तार ने इस भूमिका को और व्यापक बनाया है। अब स्थानीय घटनाओं की जानकारी भी कुछ ही मिनटों में देशभर में पहुंच सकती है। इससे नागरिकों को अपनी बात रखने और सार्वजनिक मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने के नए अवसर मिले हैं।
लेकिन तेजी से प्रसारित होने वाली सामग्री के साथ तथ्यात्मक शुद्धता, निष्पक्षता, संदर्भ और जिम्मेदारी का महत्व भी बढ़ जाता है। किसी घटना का अधूरा वीडियो, अपुष्ट जानकारी या भ्रामक प्रस्तुति लोगों के बीच गलतफहमी पैदा कर सकती है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ तथ्यों की पुष्टि और जिम्मेदार रिपोर्टिंग भी आवश्यक है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय होने या मोबाइल से वीडियो बनाने के आधार पर किसी व्यक्ति को स्वतः पेशेवर पत्रकार मान लेने अथवा उसके अधिकारों से वंचित कर देने—दोनों स्थितियों पर सावधानी से विचार किया जाए।
अब किन सवालों पर होगा विचार?
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखे हैं—
⚫ स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों की पहचान के लिए कौन-से मानदंड होने चाहिए?
⚫ क्या केवल पीआईबी की मान्यता को पत्रकारिता की पहचान का एकमात्र आधार बनाया जा सकता है?
⚫ विरोध-प्रदर्शनों और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान पत्रकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?
⚫ पत्रकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और रील बनाने वालों के बीच अंतर तय करने का उचित तरीका क्या हो?
⚫ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पेशेवर पत्रकारिता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?
इन प्रश्नों का समाधान पत्रकारिता जगत, प्रशासन और आम नागरिकों—सभी के लिए महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने डिजिटल दौर की पत्रकारिता से जुड़े एक महत्वपूर्ण विमर्श को सामने ला दिया है। मोबाइल फोन ने सूचना जुटाने और उसे लोगों तक पहुंचाने की शक्ति आम नागरिकों के हाथों में जरूर दी है, लेकिन पत्रकारिता का महत्व केवल वीडियो बनाने या उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करने तक सीमित नहीं है।
तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्षता, जनहित, जिम्मेदारी और जवाबदेही पत्रकारिता के महत्वपूर्ण आधार हैं। वहीं, स्वतंत्र पत्रकारों को केवल इस वजह से उनके पेशेवर कार्य से वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि वे किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़े नहीं हैं
इस प्रश्न पर भी गंभीरता से विचार आवश्यक है।
अब देखना होगा कि इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान अदालत इन विभिन्न श्रेणियों, पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर किस प्रकार विचार करती है। फिलहाल, इस सुनवाई ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या मोबाइल फोन से खबर बनाना ही पत्रकारिता है, या पत्रकारिता के साथ जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही जरूरी है ?

