यूजीसी के फैसलों से शिक्षा व्यवस्था तबाह,छात्रों के भविष्य से खिलवाड़, सरकार पर तानाशाही थोपने के गंभीर आरोप…
गौरव रक्षक/ राजेंद्र शर्मा
नई दिल्ली,29जनवरी2026
⚫यूजीसी का ‘काला कानून’ : शिक्षा सुधार या जातियों को बाँटने की साज़िश?
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर कटघरे में है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए जा रहे नए नियमों और प्रस्तावों को लेकर देशभर में असंतोष फैल चुका है। सवाल अब केवल शिक्षा की गुणवत्ता का नहीं रह गया है, बल्कि यह बहस धीरे-धीरे सामाजिक ताने-बाने तक पहुँच चुकी है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नीतियों ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को गहरे संकट में धकेल दिया है। शिक्षा सुधार के नाम पर सरकार और यूजीसी मिलकर ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जिनका खामियाज़ा सीधे-सीधे देश का छात्र और शिक्षक भुगत रहा है। हालात यह हैं कि विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सरकार की प्रयोगशालाएं बनते जा रहे हैं।
देशभर में यूजीसी के खिलाफ उबाल साफ दिखाई दे रहा है। छात्र, शिक्षक और शिक्षाविद सड़क पर हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार आंख मूंदे बैठी है।
⚫छात्रों का आरोप – भविष्य को बंधक बनाया गया⚫
छात्र संगठनों का कहना है कि यूजीसी के नए नियमों ने डिग्री की विश्वसनीयता, परीक्षा प्रणाली और रोजगार की संभावनाओं को पूरी तरह से कमजोर कर दिया है। बार-बार नियम बदलकर छात्रों को मानसिक तनाव में डाला जा रहा है।
एक छात्र नेता ने तीखा हमला करते हुए कहा,
“यूजीसी को न छात्रों की चिंता है, न शिक्षा की। यह आयोग अब केवल सरकार के इशारों पर चलने वाली कठपुतली बन चुका है।”
⚫शिक्षकों की चेतावनी – विश्वविद्यालयों की आत्मा छीनी जा रही⚫
देशभर के शिक्षक संगठनों ने आरोप लगाया है कि सरकार योजनाबद्ध तरीके से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खत्म कर रही है। नियुक्तियों, पदोन्नति और शोध जैसे गंभीर विषयों पर बिना किसी संवाद के फरमान जारी किए जा रहे हैं।
शिक्षकों का कहना है कि शिक्षा को बाजार और राजनीति के हवाले किया जा रहा है, जहां गुणवत्ता की कोई जगह नहीं बची है।
⚫राजनीतिक विरोध तेज, सरकार कटघरे में⚫
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि शिक्षा नीति पूरी तरह से विफल साबित हो रही है। नेताओं का आरोप है कि सरकार आलोचना से डरती है और सवाल उठाने वालों को दबाने की कोशिश कर रही है।
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने कहा,
“जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो सरकार चुप हो जाती है। यूजीसी अब संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि सत्ता का औज़ार बन चुकी है।”
⚫सड़कों पर छात्र, सत्ता में बैठे नेताओं की चुप्पी⚫
दिल्ली से लेकर राज्यों तक विश्वविद्यालय परिसरों में प्रदर्शन हो रहे हैं। कई जगह कक्षाओं का बहिष्कार किया गया है। छात्रों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि यूजीसी के विवादित फैसले वापस नहीं लिए गए, तो यह आंदोलन देशव्यापी रूप लेगा।
⚫शिक्षा सुधार या शिक्षा पर हमला?⚫
शिक्षा विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या यही सुधार हैं? क्या बिना ज़मीनी समझ, बिना संवाद और बिना जवाबदेही के फैसले थोपना ही नई शिक्षा नीति है?
⚫आज देश का युवा पूछ रहा है⚫
क्या सरकार को डिग्री चाहिए या दिमाग?
क्या यूजीसी शिक्षा का संरक्षक है या सत्ता का एजेंट?
अगर सरकार ने अब भी नहीं सुना, तो यह गुस्सा केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा।
⚫आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है — क्या सरकार यूजीसी के काले कानून के ज़रिये किसी विशेष वर्ग के खिलाफ काम कर रही है, या फिर सत्ता के लालच में समाज को जातियों के नाम पर बाँटने की साज़िश रची जा रही है?
⚫नीति नहीं, नियत पर सवाल⚫
सरकार बार-बार दावा करती है कि यूजीसी के नए नियम “सुधार” हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। नियुक्तियों, प्रमोशन, प्रवेश प्रक्रिया और शोध से जुड़े फैसले ऐसे बनाए जा रहे हैं, जो न तो सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हैं और न ही शिक्षा की मूल भावना को।
शिक्षाविदों का कहना है कि इन नीतियों से एक ओर जहां अवसर सीमित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास की खाई गहरी की जा रही है।
⚫जाति की राजनीति या सत्ता की मजबूरी?⚫
देश पहले ही जातिगत तनाव से जूझ रहा है। ऐसे में शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसे कानून लाना, जो किसी न किसी वर्ग को हाशिये पर धकेलते दिखाई दें, सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब सरकार रोजगार, महंगाई और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर जवाब देने में असफल होती है, तब समाज को जातियों और वर्गों में उलझाकर असली सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है।
शिक्षा को सामाजिक इंजीनियरिंग का औज़ार बनाया जा रहा
यूजीसी का काम शिक्षा को मजबूत करना है, न कि सामाजिक प्रयोग करना। लेकिन वर्तमान नीतियां यह संकेत दे रही हैं कि शिक्षा को अब सामाजिक इंजीनियरिंग का हथियार बनाया जा रहा है।
आज छात्र यह नहीं पूछ पा रहे कि उन्हें नौकरी मिलेगी या नहीं, बल्कि यह सोचने पर मजबूर हैं कि वे किस वर्ग या पहचान के तहत देखे जाएंगे।
⚫सवर्ण, दलित, पिछड़ा — नुकसान में केवल छात्र⚫
इस पूरी राजनीति में अगर कोई सबसे ज़्यादा नुकसान उठा रहा है, तो वह है देश का छात्र और युवा। जाति के नाम पर फैसले हों या जाति को नज़रअंदाज़ करके बनाए गए नियम — दोनों ही स्थितियों में शिक्षा की गुणवत्ता और समान अवसरों का सपना टूटता जा रहा है।
⚫सरकार को जवाब देना होगा⚫
सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि यूजीसी के ये कानून किसके हित में हैं।
क्या ये कानून शिक्षा को सशक्त बनाने के लिए हैं या फिर समाज को बाँटकर सत्ता को मजबूत करने की रणनीति?
देश का युवा अब भावनात्मक नारों से नहीं, ठोस जवाब चाहता है। शिक्षा सुधार के नाम पर अगर सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दिया गया, तो इतिहास इसे माफ नहीं करेगा।
